Radha Krishan Seeds Barley
Radha Krishan Hybrid Seeds Company
जौ फसल उत्पादन की समग्र सिफारिशें
भूमि :-
दोमट एवं चिकनी दोमट, रेतीली भूमि जौ फसल के उत्पादन के लिये उपयुक्त है। भूमि में पानी की निकासी (ड्रेनेज) उत्तम होना चाहिए। यह हल्की लवणीय भूमि में भी उगाया जा सकता है।
खेत की तैयारी :-
जौ की अच्छी फसल लेने के लिये भूमि की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर दो-तीन जुताई देशी हल, कल्टीवेटर/रोटावेटर/हैरो द्वारा करके तैयार करनी चाहिए।
बीज की मात्रा :-
सिंचित खेती के लिये 35 किलो तथा बारानी खेती के लिये 40 किलो उच्च गुणवत्ता का बीज पर्याप्त होता है। विलम्ब से. बिजाई करने के लिये 45 किलो बीज डालना चाहिए। दो कतार वाली किस्मों का 35 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।
बिजाई का समय :-
हरियाणा में 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक बिजाई का उत्तम समय है। दिसम्बर की बिजाई पछेती बिजाई कहलाती है। दक्षिणी पश्चिमी हरियाणा में अक्टूबर के आखरी सप्ताह से नवम्बर के पहले सप्ताह में बिजाई की जाती है।
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किस्में :-
जौ की उत्तम किस्मे भ-393, भ-75, भ-902, भ-946 तथा पीएल-419, पीएल-172., आरडी-2052, आरडी-3660, रह-2035, आरडी-3503, आरडी-2503, आरडी-2508. आरडी-2552, आरडी-2668
बिजाई का तरीका :-
अच्छी पैदावार लेने के लिए जौ का बीज बखेर कर न बोयें, लाईन से लाईन का अन्तर 22 सें.मी., पौधों में अन्तर 5 सें.मी. रखते हुए सीड ड्रिल से बिजाई करें। यदि विलम्ब से बिजाई कर रहे हैं तो लाइनों के मध्य अन्तर घटा कर 18 सें.मी. रखें। जौ की बिजाई जीरो टिलेज विधि द्वारा भी की जा सकती है। जीरो टिलेज विधि द्वारा बिजाई के लिये खरपतवार नियन्त्रण हेतु बिजाई से पूर्व आधा लीटर / एकड़ ग्रमिक्सोन (पैराक्वाट) 200 लीटर पानी में खेत में छिड़क कर नियन्त्रित किया जा सकता है। जीरो टिलेज विधि अपना कर किसान पानी की बचत कर सकते हैं।
7 उर्वरक :-
हरियाणा में जौ की सिंचित खेती के लिये नाइट्रोजन 24 Kg (यूरिया 50 Kg), P,O, 12 Kg (75 Kg S.S.P.). K.O 6 Kg (10 किलो म्यूरिट ऑफ पोटाश) उर्वरक की मात्रा दें। फासफोरस, पोटाश और जिंक को खेत की तैयारी करते समय भूमि में मिला दें और यूरिया पहली सिंचाई पर दें।
8. उपचार :-
बीज को बिजाई के पूर्व 1 ग्राम प्रति किलो Tabuconazol (Raxil) या 2 ग्राम / किलो Cauboxin-vitavax या कार्बन्डाजिम (Bavislin) से उपचारित करके जी की फसल को खुली कगयारी, बन्द कगयारी तथा Leaf Strike की रोकथाम की जा सकती है।
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9. खरपतवार नियन्त्रण :-
बाथु बथुआ, खरबथुआ. पालक घास, पीत पापड़ा आदि को चौडी पत्ति वाले खरपतवारों के नियन्त्रण हेतु मैटसल्फयुरान % मिथाईल एलग्रिप 8 ग्राम 20 D.P. + 200 ml Surfactant या एफीनिटि 40 D.F. 20 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिला कर 35 दिन बाद सिंचाई करके छिड़कें। घास कुल, सकरी पत्ति के घास, कनकी, जंगली जई, लोम्मड घास, प्याजी क्लोडिनोपोफ टोपिक 15% W.P. 160 ग्राम रसायन 200 लीटर पानी में सिंचाई के बाद 30-35 दिनों में स्प्रे करें। दोनों तरफ के खरपतवार हों तो ATLANTIS 3% Metsulphuran methyle 160 gm/Acre का प्रयोग करें।
10. सिंचाई:-
जो की उत्तम उपज लेने के लिए दो सिंचाई पर्याप्त है पहली सिंचाई बिजाई के 40-45 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई 80-85 दिन बाद करनी चाहिए।
11. फसल संरक्षण :-
(A) व्याधियाँ –
खुली कनियारी Loose Smut, बन्द कगियारी Covered Smut के लिये 2 ग्राम प्रति किलो Carbindazim (बाविस्टिन) या Cauboxin (विटावैक्स) से बीज उपचारित कर बिजाई करें। पीत या काली रौली के लिये वाली आने से पूर्व 800 ग्राम मैक्कोजैब या जाइनेव 200 लीटर पानी में मिला कर छिडके।
टिप्पणी :-
इस विवरणिका में फसल उत्पादन की समग्र सिफारिशें कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि ज्ञान केन्द्रों, कृषि विज्ञान केन्द्रों के कृषि वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों तथा सरकार के कृषि विदों के अनुसन्धान एव अनुभवों पर आधारित है। फसल / किस्म का उत्पादन मात्र बीज पर निर्भर नहीं करता बल्कि भूमि, खाद, उर्वरक तथा अन्य कारकों तथा वातावरण पर निर्भर करता है। भिन्न प्रदेशों / क्षेत्रों के कृषक स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों, कृषि विदों की सलाह और स्वयं के अनुभव का उपयोग कर उत्तम ही नहीं सर्वोत्तम उत्पादन ले सकते हैं।
