भूमि व खेत की तैयारी :-
गेहूँ अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छे जल निकास वाली मध्यम दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त है। कल्लर व सेम वाली भूमि इसके लिए ठीक नहीं है। पलेवा के बाद खेत की 3-4 जुताईयां करके सुहागा लगाएं तथा खेत में घास-फूस न रहने दें। धान-गेहूँ फसल चक्र में गेहूँ की जीरो टिल ड्रिल मशीन से तप्पड़ में भी बिजाई की जा सकती है।
किस्में :-
DBW-187, DBW-2022, DBW-303, DBW-327, DBW-370, DBW-371, DBW-372 HD-2967, HD-3410, HD-3390, HD-3406, HD-2851, HD-3086, HD-3385 WH-1105, WH-711, WH-1290, WH-1124 PBW-343, PBW-826, 4-PBW-550, 4-PBW-343, PBW-502, PBW-872, PBW-677, PBW-725, PBW-766 Raj-3765, Raj-3077, Raj-4120, Raj-1482
बीज की मात्रा :-
बीज की मात्रा किस्म व बिजाई के समय पर निर्भर करती है। छोटे साईज के बीज वाली किस्मों का 40 कि.ग्रा. व मोटे बीज वाली किस्मों का 50 कि.ग्रा. बीज प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए। छिड़काव विधि द्वारा बिजाई करने पर 50 कि.ग्रा. तथा पछेती बिजाई में 60 कि.ग्रा. बीज प्रति एकड डालें ।
बिजाई का समय :-
सिंचित क्षेत्रों में समय की बिजाई 25 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक कर लेनी चाहिए। पछेती बिजाई के लिए कम समय में तैयार होने वाली किस्मों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। पछेती बिजाई दिसम्बर के तीसरे सप्ताह तक कर लेनी चाहिए तथा उसके बाद गेहूँ की बिजाई लाभदायक नहीं होती। बिजाई के समय तापमान 22°C ± होना चाहिए।
बीज उपचार :-
बीज को 2 ग्राम प्रति किलो कार्बनडाजिम (बावस्टीन कार्बोक्सिन) या 1 ग्राम प्रति किलो (टेबुकोनाजोल) रैक्सिल से और फास्पोटीका एजोटीका से उपचारित कर लें।
बिजाई का तरीका :-
गेहूँ की बिजाई जहाँ तक सम्भव हो बीज एवं खाद ड्रिल से करें। बिजाई 20×5 सें.मी. व बीज को 5 सें.मी. की गहराई पर बोएं। प्रति एकड़ पौधों की वांच्छित संख्या लगभग 4,00,000 हो। पछेती बिजाई में खूडों के मध्य फासला 18 सें.मी. रखें। धान-गेहूँ फसल चक्र वाले क्षेत्रों में जीरो टिल ड्रिल मशीन द्वारा बिना खेत जुताई के भी बिजाई सफलतापूर्वक की जा सकती है। कम्बाईन से कटे धान के खेत में हैप्पी सीडर द्वारा भी बिजाई की जा सकती है।
उर्वरक ÷
गेहूं में उर्वरकों की निम्न मात्रा प्रयोग करें ÷
| पोषक तत्व (कि.ग्रा./एकड़) | उर्वरक मात्रा (कि.ग्रा./एकड़) | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नाइट्रोजन | फास्फोरस | पोटाश | यूरिया | सिंगल सुपर फास्फेट | म्यूरेट ऑफ पोटाश | जिंक सल्फेट | ||
| सिंचित | 60 | 24 | 12 | सिंचित | 130 | 150 | 20 | 10 |
| असिंचित | 12 | 6 | – | असिंचित | 26 | 40 | – | – |
फॉस्फोरस, पोटाश व जिंक की पूरी मात्रा तथा एक तिहाई नाईट्रोजन बिजाई के समय ड्रिल करें। एक तिहाई नाईट्रोजन पहली सिंचाई पर तथा शेष बची हुई एक तिहाई नाईट्रोजन दूसरी सिंचाई के समय देनी चाहिए।

सिंचाई :-
गेहूँ में सामान्यतः 4-6 सिंचाईयों की जरूरत पड़ती है। हल्की व मध्यम भूमियों में 6 तथा भारी भूमियों में 4 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। यदि सिंचाईयों की उपलब्धता पर्याप्त न हो तो निम्नलिखित अवस्थाओं पर सिंचाई करनी चाहिए।
| सिंचाइयों की उपलब्धता | बिजाई के बाद सिंचाई के दिन |
|---|---|
| दो | 22, 85 |
| तीन | 22, 65, 105 |
| चार | 22, 45, 85, 105 |
| पाँच | 22, 45, 65, 85, 105 |
| छः | 22, 45, 65, 85, 105, 120 |
खरपतवार नियंत्रण :-
गेहूँ में संकरी पत्ती वाले खरपतवारों (गुल्ली डंडा, जंगली जई आदि) की रोकथाम के लिए 500 ग्राम आईसोप्रोटूरान 75 प्रतिशत घु.पा. (ऐरीलोन, डैलरोन, टोरस) या 160 ग्राम क्लोडिनोफोप (टोपिक / प्वाईंट) 15 प्रतिशत घु.पा. को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड की दर से बिजाई के 35-45 दिन बाद स्प्रे करें।
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे बथुआ, कंडाई, प्याजी व जंगली पालक आदि की रोकथाम के लिए मैटसलफ्यूरान (एलग्रीप) 8 ग्राम / एकड़ की दर से बिजाई के 30-35 दिन बाद छिडकाव करें।
गेहूँ में मिले-जुले खरपतवारों (चौड़ी व संकरी पत्ती वाले) के नियंत्रण के लिए टोटल (सल्फोसल्फ्यूरान + मैटसल्फ्यूरान) 16 ग्राम प्रति एकड़ या वेस्टा (क्लोडिनोफोप-प्रोपायर्जिल+मैटसल्फ्यूरान मिथाईल) 160 ग्राम प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में घोलकर बिजाई के 35-45 दिन बाद स्प्रे करें। खरपतवारनाशी के छिड़काव के लिए हमेशा फ्लैट फेन नोजल का प्रयोग करें। जहाँ ‘टोटल’ नामक खरपतरवारनाशी का छिड़काव किया गया है उस खेत में ज्वार या मक्की की फसल न लें।
बीमारियाँ व उनकी रोकथाम :-
पीला, भूरा व काला रतुआ दिसम्बर, जनवरी / फरवरी में कम तापमान होने की वजह से आता है। रोग रोधी किस्मों के अलावा 800 ग्रा. मैंकोजेब (डाइथेन एम. 45) प्रति एकड़ 200 लीटर पानी के साथ 10-15 दिन के अन्तर पर दो छिड़काव करें। गेहूँ में मोल्या रोग (नीमाटोड) से प्रभावित फसल में पौधे पीले रंग के होकर वृद्धि रूक जाती है तथा जड़ों में बालों की तरह गुच्छे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 13 कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरान (फ्यूराडान 3जी) प्रति एकड़ के हिसाब से बिजाई के समय खादों के साथ दें। करनाल बन्ट के लिये 250 ग्राम टिल्ट (प्रेपीकोनाजोल) 200 लीटर पानी में बाल निकलते समय छिड़काव करें।
टिप्पणी :-
इस विवरणिका में फसल उत्पादन की समग्र सिफारिशें कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि ज्ञान केन्द्रों, कृषि विज्ञान केन्द्रों के कृषि वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों तथा सरकार के कृषि विदों के अनुसन्धान एवं अनुभवों पर आधारित है। फसल / किस्म का उत्पादन मात्र बीज पर निर्भर नहीं करता बल्कि भूमि, खाद, उर्वरक तथा अन्य कारकों तथा वातावरण पर निर्भर करता है। भिन्न प्रदेशों/क्षेत्रों के कृषक स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों, कृषि विदों की सलाह और स्वयं के अनुभव का उपयोग कर उत्तम ही नहीं सर्वोत्तम उत्पादन ले सकते हैं।
